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August 5, 2026
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होलिका दहन : जानें भक्त प्रह्लाद से लेकर होलिका दहन की पूरी कहानी

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को भद्र रहित मुहूर्त में होलिका दहन होता है। इस वर्ष होलिका दहन 28 मार्च यानी रविवार को है। जिसका शुभ मुहूर्त शाम 6:37 मिनट से रात 8:56 मिनट तक हैं। इस दिन लोग अपने अंदर की बुराइयों को दूर करने का प्रण लेते हैं। वहीं दूसरे दिन रंगों की होली खेलते हैं। होली तो हमें सालों से खेलते हैं आ रहे हैं,होलिका दहन 28 मार्च को है। इस दिन को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। मान्यताओं के अनुसार, विष्णु भक्त प्रहलाद को जब राक्षस हिरण्यकश्यप की बहन और प्रहलाद की बुआ होलिका आग पर बिठाकर मारने की कोशिश करती है तो वे खुद जल जाती है। इसी के नाम पर होलिका दहन की परंपरा शुरू हुई थी। होलिका दहन को समाज की बुराई को जलाने के प्रतीक के तौर पर मनाया जा जाता है।

विष्णुपुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार दैत्यों के प्रमुख कश्यप और उनकी पत्नी दिति के पुत्र थे हिरण्यकश्यप । उसने कठिन तपस्या कर ब्रह्मा को प्रसन्न कर लिया था। वहीं वरदान प्राप्त किया कि वह न किसी मनुष्य द्वारा मारा जा सकेगा, न पशु द्वारा, नहीं दिन में मारा जा सकेगा और न रात्री में, न घर के अंदर न बाहर, न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र से वह मरेगा। इस वरदान ने हरिण्यकशिपु को अहंकारी बना दिया। वह खुद को अमर समझने लगा। उसने इंद्र का राज्य तक छीन लिया और तीनों लोकों को परेशान करने लगा। वह खुद को भगवान समझने लगा था और चाहता था कि सब लोग उसकी पूजा करें।लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का उपासक भक्त था। हिरण्यकश्यप ने भक्त प्रहलाद को बुलाकर भगवान विष्णु का नाम न जपने को कहा तो प्रहलाद ने कहा, पिताजी! परमात्मा ही समर्थ है, प्रत्येक कष्ट से परमात्मा ही बचा सकता है। इस बात को सुनकर अहंकारी हिरण्यकश्यप क्रोध से भर गया और पुत्र प्रहलाद को कई तरीकों से मरवाने का प्रयास किया लेकिन हर बार प्रभु विष्णु ने उसकी जान बचा ली।

प्रह्लाद की भक्ति से परेशान हिरण्यकशिपु ने बेटे को मारने के लिए बहन होलिका से मदद मांगी

प्रह्लाद की भक्ति से परेशान हिरण्यकश्यप ने बेटे को मारने के लिए बहन होलिका से मदद मांगी। होलिका के पास एक चुनरी थी, जिसे पहनने पर वह आग के बीच बैठ सकती थी। उसे भी वरदान था ओढ़नी पर आग का कोई असर नहीं होता था। नाराज हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन से कहा कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर प्रज्जवलित आग में बैठ जाएं। होलिका वही चुनरी ओढ़कर प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई। भगवान की माया का असर हुआ कि हवा चली और चुनरी होलिका के ऊपर से उड़कर प्रह्लाद पर आ गई। इस तरह प्रह्लाद का कुछ भी नहीं हुआ और होलिका जलकर राख हो गई।

होलिका दहन को समाज की बुराई को जलाने के प्रतीक के तौर पर मनाया जा जाता है।

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