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August 5, 2026
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धर्म

रविवार को कभी न करें ये काम, सूर्य देव होंगे नाराज

रविवार का दिन सूर्य देव का दिन माना गया है। मान्यता है कि इस दिन सूरज की पूजा करने और जल अर्पण करने पर वे प्रसन्न होते हैं। वह जातकों को पुत्र, धन, रत्न, धैर्य और बुद्धि की प्राप्ति होती है। हालांकि सूर्य देव क्रोधित भी जल्द हो सकते हैं। कुछ ऐसे कार्य हैं, जिन्हें करने पर भास्कर देव नाराज हो जाते हैं। वह भक्त को उसका आगे जाकर खामियाजा भुगतना पड़ता है। आइए जानते हैं कौन-से काम रविवार को नहीं करना चाहिए। वह सूर्य देव को प्रसन्न करने के उपाय।

रविवार को न करें ये काम

  • विवार के दिन शराब और मांस का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • रविवार के दिन बाल नहीं कटवाना चाहिए। इससे सूर्य देव कमजोर हो जाते हैं।
  • रविवार के दिन दूध नहीं जलाना चाहिए।
  • रविवार के दिन नीला, काला या सलेटी रंग के वस्त्र न पहनें।
  • तांबा बेचने और तेल की मालिश कराने पर सूर्य देव नाराज हो सकते हैं।

सूर्य देव को प्रसन्न करने करें श्री सूर्यस्तवराजः का पाठ

स्तुवंस्तत्र ततः साम्बः कृशो धमनि संततः।

राजन् नामसहस्त्रेण सहस्त्रांशुं दिवाकरम्।। 1।।

खिद्यमानं तु तं दृष्टा सूर्यः कृष्णात्मजं तदा।

स्वप्ने तु दर्शनं दत्त्वा पुनर्वचनमब्रवीत्।।2।।

साम्ब साम्ब महाबाहो श्रृणु जाम्बवतीसुत।

अलं नामसहस्त्रेण पठंस्त्वेवं स्तवं शुभम्।।3।।

यानि नामानि गुह्मानि पवित्राणि शुभानि च।

तानि ते कीर्तयिष्यामि श्रुत्वा तमवधारय।।4।।

ऊँ विकर्तनो विवस्वांश्च मार्तण्डो भास्करो रविः।

लोकप्रकाशकः श्रीमॉल्लोकचक्षुर्गहेश्वरः।।5।।

लोकसाक्षीः त्रिलोकेशः कर्ता हर्ता तमिस्रहा।

तपनस्तापनश्चैव शुचिः सप्ताश्ववाहनः।।6।।

गभस्तिहस्तो ब्रह्मा च सर्वदेवनमस्कृतः।

एकविंशतिरित्येष स्तव इष्टः सदा मम।।7।।

शरीरारोग्यश्चैव धनवृद्धियशस्करः।

स्तवराज इति ख्यातिस्त्रिषु लोकेषु विश्रुतः।।8।।

य एतेन महाबाहो द्वे संध्येस्तमनोदये।

स्तौति मां प्रणतो भूत्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।।9।।

कायिकं वाचिकं चापि मानसं यच्च दुष्कृतम्।

तत् सर्वमेकजाप्येन प्रणश्यति ममाग्रतः।।10।।

एष जप्यश्च होमश्च संध्योपासनमेव च।

बलिमन्त्रोर्घ्यमन्त्रश्च धूपमंत्रस्तथैव च।।11।।

अन्नप्रदाने स्नाने च प्रणिपाते प्रदक्षिणे।

पूजितोयं महामंत्रः सर्वव्याधिहरः शुभः।।12।।

एवमुक्त्वा तु भगवान् भास्करो जगदीश्वरः।

आमन्त्रय कृष्णतनय तत्रैवान्तरधीयत।।13।।

साम्बोपि स्तवराजेन स्तुत्वा सप्ताश्ववाहनम्।

पूतात्मा नीरुजः श्रीमांस्तस्माद् रोगाद् विमुक्तवान्।।14।।

डिसक्लेमर

‘इस लेख में दी गई जानकारी/सामग्री/गणना की प्रामाणिकता या विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। सूचना के विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/धार्मिक मान्यताओं/धर्मग्रंथों से संकलित करके यह सूचना आप तक प्रेषित की गई हैं। हमारा उद्देश्य सिर्फ सूचना पहुंचाना है, पाठक या उपयोगकर्ता इसे सिर्फ सूचना समझकर ही लें। इसके अतिरिक्त इसके किसी भी तरह से उपयोग की जिम्मेदारी स्वयं उपयोगकर्ता या पाठक की ही होगी।’

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