
मध्य प्रदेश पंचायत चुनाव को लेकर राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए अध्यादेश के पश्चात अध्यादेश के खिलाफ हाईकोर्ट में पंचायत चुनाव के परिसीमन और आरक्षण को लेकर दायर याचिकाएं दायर हुई थी। उस समय जबलपुर हाईकोर्ट ने इन याचिकाओं पर अर्जेंट हियरिंग से इनकार कर दिया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से मामले पर जल्द सुनवाई का निवेदन किया गया था।
मुख्य न्यायाधीश मलिमठ की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा था कि शीतकालीन अवकाश के बाद ही मामले पर सुनवाई की जाएगी। आज भी याचिकाओं पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सभी याचिकाओं को अप्रासंगिक बताते हुए निरस्त कर दिया है।
मध्य प्रदेश पंचायत चुनाव की याचिकाओं की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट में हुई
पंचायत चुनाव के लिए राज्य सरकार द्वारा जारी किए गए अध्यादेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि एक मामले में दो कोर्ट को शामिल नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता अपना पक्ष हाई कोर्ट में ही रखें। नौ दिसंबर को हाईकोर्ट ने मामले पर हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था और सरकार के अध्यादेश पर स्थगन नहीं दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 243 (O) में निहित प्रावधान के तहत चुनाव की अधिसूचना जारी हो जाने के बाद अदालत को उसमें हस्तक्षेप का अधिकार नहीं रहता।
ग्वालियर पीठ भी कर चुकी मना
इसके पहले 7 दिसंबर 2021 को ग्वालियर खंडपीठ ने भी अंतरिम राहत का आवेदन निरस्त कर दिया था, इसलिए ऐसी स्थिति में राहत नहीं दी जा सकती। हालांकि याचिकाकर्ताओं ने अब सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है। कोर्ट ने इस मामले में ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के प्रमुख सचिव, पंचायत राज संचालनालय के आयुक्त सह संचालक एवं राज्य चुनाव आयोग से जवाब मांगा है।
दरअसल, 21 नवंबर 2021 को राज्य सरकार ने अध्यादेश जारी कर आगामी पंचायत चुनाव में 2014 के आरक्षण रोस्टर और परिसीमन के आधार पर चुनाव कराए जाने की घोषणा की है। इसके बाद राज्य सूचना आयोग ने पंचायत चुनाव के लिए चार दिसंबर 2021 को अधिसूचना जारी कर दी।
प्रदेश में पंचायत चुनाव के पहले चरण में छह जनवरी को मतदान होगा। राजेश वैश्य, राजेश पटेरिया समेत एक दर्जन से अधिक याचिकाओं में उक्त अध्यादेश और अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगाने की मांग की गई थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक कृष्ण तन्खा, अधिवक्ता महेन्द्र पटेरिया ने दलील दी कि पुराने रोस्टर और परिसीमन के तहत चुनाव कराना संविधान की मंशा के विपरीत है। संविधान के अनुच्छेद (डी) के अनुसार कार्यकाल समाप्त होने के बाद आरक्षण रोस्टर बदलना जरूरी है।
राज्य सरकार ने यह दलील दी थी
जिला, जनपद और ग्राम पंचायतों के उम्मीदवारों ने नए रोस्टर के तहत इसकी तैयारी कर ली थी। अब पुराने रोस्टर से चुनाव कराने से सभी समीकरण बदलने होंगे। तो चुनाव होगा प्रभावित- राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ सेठ ने दलील दी थी कि संविधान के अनुच्छेद 243 (ओ) के अनुसार चुनाव की घोषणा के बाद कोर्ट को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है।
पंचायत चुनाव की तैयारियां हो गई है
कार्यकाल मार्च 2020 में पूरा हो चुका है। कोविड के कारण चुनाव में देरी हो चुकी है, तैयारी पूरी हो गई है और वोटर लिस्ट तैयार है। अब चुनाव टलेगा तो नए सिरे से वोटर लिस्ट व अन्य प्रक्रिया करनी होगी, जिससे पूरा चुनाव प्रभावित होगा।
