
हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष नवरात्रि की शुरुआत 7 अक्टूबर 2021 को हो रही है
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ज्योतिषाचार्य ध्रुव जी ने बताया कि वेदांगों के अनुसार नवरात्र शब्द से ‘नव अहोरात्रों अर्थात विशेष रात्रियों का बोध’ होता है एवं ‘रात्रि’ शब्द को सिद्धि का प्रतीक माना जाता है। भगवान शिव के अनुसार नवरात्रि के विषय में एक श्लोक का वर्णन मिलता है ।
नव शक्तिभि: संयुक्त नवरात्रं तदुच्यते ! एकैक देव-देवेशि नवधा परितिष्ठता !!
अर्थात् नवरात्र नवशक्तियों से संयुक्त है। इसकी प्रत्येक तिथि को एक-एक शक्ति के पूजन का विधान है ।
श्लोक-
प्रथमं शैलपुत्री च, द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति, कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।
पंचमं स्कन्दमातेति, षष्ठं कात्यायनीति च। सप्तमं कालरात्रीति, महागौरीति चाष्टमम्। नवमं सिद्धिदात्री च, नवदुर्गा: प्रकीर्तिता: उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना:
इस तरह से नवरूपों की पूजा की जाती है अतः सभी मनुष्यों को नवरात्रि में स्वयं एवं जगमंगल की कामना से मां भगवती की आराधना करनी चाहिए ।

कब से प्रारंभ हो रही है नवरात्रि❓
हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष नवरात्रि की शुरुआत 7 अक्टूबर 2021 को हो रही है ज्योतिषाचार्य नागेन्द्र किंकर ध्रुव जी ने बताया कि श्रीमद्देवीभागवत महापुराण में वर्णन मिलता है कि ……
शशि सूर्य गजरुढां शनिभौमै तुरंगमे।
गुरौशुक्रे च दोलायां बुधे नौकाप्रकीर्तिता॥
अर्थात_
नवरात्रि की शुरुआत सोमवार या रविवार को हो तो माता हाथी पर सवार होकर आती हैं यदि नवरात्रि की शुरुआत शनिवार और मंगलवार को माता घोड़े पर सवार होकर आती हैं इसके साथ ही जब गुरुवार या शुक्रवार को नवरात्रि की शुरूआत हो तो माता डोली पर सवार होकर आती हैं ।
इसलिए इस बार शारदीय नवरात्र गुरुवार से प्रारम्भ हो रहा है अतः मैया डोली पर सवार होकर आएंगी । ज्योतिष शास्त्र में तिथियों का बड़ा महत्व है और इसी कारणवश हम तिथियों को विशेष ध्यान देते हैं इसबार एक तिथि के क्षय होने के कारण नवरात्र में आठ दिनों तक ही आदिशक्ति के पूजन का अवसर मिलेगा अर्थात सभी श्रद्धालु 7 अक्टूबर से लेकर 14 अक्टूबर तक पूजन करेंगे इस समय अंतराल में 12 अक्टूबर को सप्तमी , 13 अक्टूबर को महाअष्टमी 14 को महानवमी एवं 15 अक्टूबर 2021 को विजयादशमी मनाई जाएगी ।
नवरात्रि में किये गए अनुष्ठानों में मिलती है सफलता –
इस समय अंतराल में योग्य ब्राह्मणों द्वारा किये गये अपराजिता अनुष्ठान से विजय , श्रीसूक्त के अनुष्ठान से लक्ष्मी प्राप्ति एवं शतचंडी है सहस्त्रचंडी के अनुष्ठान से मनोकामना की पूर्ति होती है । इसके अलावा दुर्गासप्तशती में उदृत मन्त्रों के किसी भी मनचाहे मन्त्र से सम्पुट लगाकर अनुष्ठान करने से अभीष्ट सिद्धि होती है ।
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