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August 3, 2026
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इतिहास

छत्रपति शिवाजी महाराज का इतिहास

छत्रपति शिवाजी महाराज-Shivaji Maharaj भारत के उन महान सपूतों में से एक हैं जो लोगों के दिलों पर राज करते हैं। वे एक अद्भुत और महान योद्धा थे, उनकी रणनीति अनोखी थी, जब लगभग सम्पूर्ण उत्तर भारत मुगलों के अधीन हो चुका था, ऐसे समय में 1674 ई. में  शिवाजी महाराज Shivaji Maharaj ने पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की नींव रखी। रायगढ़ में 1674 में उनका राज्याभिषेक हुआ और वह छत्रपति बने। उन्होंने डेक्कन के शासकों और मुगलों से युद्ध किया। उन्होंने मराठाओं को संगठित कर पूर्ण स्वराज के सपने को हर भारतीय दिल में भर दिया।

वीर शिवाजी महाराज Sivaji Maharajने छापामार युद्ध शैली और सुसंगठित प्रशासनिक इकाइयों से एक सुदृढ़ और प्रगतिशील प्रशासन प्रदान किया। उन्होंने प्राचीन हिन्दू धर्म की प्रथाओं को पुनः शुरु किया। और अपने दरबार में फारसी की जगह संस्कृत और मराठी को राज-काज की भाषा बनाया। 

शिवाजी महाराज-Shivaji Maharaj का जन्म

शिवाजी महाराज Sivaji Maharaj का जन्म 19 फरवरी 1630 में पुणे स्थित शिवनेरी दुर्ग में हुआ था। कुछ दूसरे कैलेंडर के अनुसार उनके जन्म की तिथि 6 अप्रैल 1627 भी बताया जाता है। कुछ में 4 मार्च भी बताया गया है। महाराष्ट्र सरकार ने 19 फरवरी 1630 को उनका जन्म दिन माना है।

3 अप्रैल 1680 में रायगढ़ किले में भारतीय गणराज्य के महानायक, वीर छत्रपति शिवाजी महाराज का निधन हो गया।

शिवाजी महाराज-Shivaji Maharaj के माता-पिता    

शिवाजी महाराज Sivaji Maharaj की माता का नाम जीजाबाई और पिता का नाम शाहजी भोंसले था। इनके पिता शाहजी भोंसले एक मराठा सेनापति थे। जो डेक्कन सल्तनत के लिए काम करते थे। शिवाजी महाराज की माँ जीजाबाई सिंधखेड़ के लाखूजी राव जाधव की बेटी थीं। धार्मिक विचारों वाली असाधारण प्रतिभा सम्पन्न महिला थीं। शाहजी भोंसले एक शक्तिशाली सामंत थे। वे अत्यंत वीर योद्धा थे। उन्होंने अपनी जागीर हमेशा पुणे ही रखी। उनके साथ उनकी एक छोटी सी सेना भी थी। उनकी दूसरी पत्नी का नाम तुकाबाई मोहिते था। शिवाजी के चरित्र पर अपने मातापिता का बहुत प्रभाव पड़ा। जिस समय शिवाजी का जन्म हुआ उस समय डेक्कन की सत्ता तीन इस्लामिक सल्तनतों- बीजापुर में आदिलशाही, अहमदनगर में निजामशाही और गोलकोंडा में कुतुबशाही में बँटी हुई थी।

शिवाजी महाराज-Shivaji Maharaj की शिक्षा और चरित्र-विकास

शिवाजी महाराज Shivaji Maharaj की सर्वप्रथम शिक्षिका उनकी माँ जीजाबाई थीं। उन्होंने अपने पुत्र में, रामायण और महाभारत की कहानियाँ सुनाकर, बचपन से ही वीरता की भावना भर दिया था। उनके पिता शाहजी एक शूरवीर योद्धा थे। शिवाजी महाराज के चारित्र पर माता-पिता का बहुत प्रभाव पड़ा। माँ जीजाबाई, हिन्दू धर्म के महान आदर्श पुरुषों की कहानियाँ सुनाकर, शिवाजी महाराज को उन महान पुरुषों की तरह बनने को प्रेरित करती रहती थीं। शिवाजी के महान राजा और योद्धा बनने की नींव, बचपन में ही उनकी माँ ने रख दिया था।  बचपन में अपने बाल-मित्रों के साथ वे युद्ध करने और किले जीतने का खेल खेला करते थे। जो बाद में उनके वास्तविक जीवन में साकार रूप लेने लगा। बचपन से ही शिवाजी महाराज उस युग के वातावरण और घटनाओं को भली-भांति समझने लगे थे।

शिवाजी महाराज Shivaji Maharaj का विवाह

शिवाजी महाराज का विवाह सन् 14 मई 1640 में सईबाई निंबालकर के साथ लाल महल पूना में हुआ था। कई राजनीतिक कारणों और परिस्थिति की माँग के कारण और मराठाओं को एक करने के चलते, शिवाजी को आठ विवाह करने पड़े थे।

शिवाजी महाराज-Shivaji Maharaj का जीवन

शिवाजी महाराज Shivaji Maharaj जब बहुत छोटी अवस्था के थे, तभी से वे देश के वातावरण को समझने लगे थे। अपने देश पर शासन कर रहे शासक की क्रूरता पर वो बेचैन हो जाते थे। उनके बाल हृदय में ही स्वतंत्रता की लौ प्रज्वलित होने लगी थी।शिवाजी महाराज Shivaji Maharaj जब थोड़े बड़े हुए तो उनके पिता ने उन्हें पुणे की जागीर सौंप दी। लेकिन पतन की ओर जाती आदिलशाही की गुलामी उन्हें मंजूर नहीं थी। उन्होंने स्वतंत्र और साहसिक जीवन व्यतीत करना चाहा। उस समय बीजापुर आपसी और विदेशी संघर्षों के कारण संकट के दौर से गुजर रहा था शिवाजी महाराज Shivaji Maharaj ने मावल के कुछ देशभक्त साथियों के साथ मिलकर मावल के लोगों को संगठित करना शुरु कर दिया। मावल प्रदेश पश्चिम घाट के पास 90 मील लंबा और 19 मील चौड़ा एक विशाल प्रदेश था जो सुंदर घाटियों और ऊंची पहाड़ियों से घिरा था। इस प्रदेश में ज्यादातर कोली और मराठा लोग रहते थे। कठिन और संघर्षपूर्ण जीवन जीने के कारण वे बहुत परिश्रमी और मजबूत थे। शिवाजी महाराज Shivaji Maharaj ने उन लोगों को एकत्रित कर, विदेशी दासता से छुटकारा दिलाने का विश्वास जगाया। अवस्था बढ़ने के साथ-साथ उनका मनोबल भी दोगुनी तेजी से बढ़ने लगा। शिवाजी महाराज Sivaji Maharaj जिस समय मराठाओं को संगठित कर रहे थे । उस समय दिल्ली की गद्दी पर औरंगजेब का अधिकार हो चुका था। औरंगजेब अपने पिता शाहजहाँ को आगरा के किले में कैद कर स्वयं बादशाह बन बैठा था। उस समय लगभग पूरे उत्तर भारत में मुगलों का अधिकार हो चुका था। भारत के कुछ गिने-चुने शूरवीर राजाओं को छोड़कर, अधिकतर राजाओं ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। मुगलों की क्रूरता पहले के शासकों से ज्यादा बढ़ गई थी। हिन्दू धर्म खतरे में था। ऐसे समय में दक्षिण में, शिवाजी ने पूर्ण स्वराज का सपना दिखाकर मराठाओं को एकत्र कर अपनी ताकत को काफी बढ़ा लिया था। शिवाजी महाराज Sivaji Maharaj जानते थे की मावल के लोगों में गुलामी से निकलने की छटपटाहट है, उनमें कुछ भी कर गुजरने का जज्बा है, जरूरत है सही नेतृत्व की। शिवाजी ने उन्हें छापामार युद्ध में पारंगत किया और अपनी सेना तैयार कर ली।

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